Tuesday, 14 September 2021

हिंदी दिवस पर कविता

 हिंदी दिवस स्पेशल:-

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हिंदी हमारी मां है

हिंदी हमारी पहचान 

करो इसका सम्मान सभी 

हिंदी है बहुत महान 

हिंदी है बहुत महान

देश की शान हमारी 

हिंदी है हमको 

अपनी जान से प्यारी 

दिल में एक अरमान लिए 

घूमा करती हूं

हिंदी है मेरी और मैं हिंदी मां की बेटी हूं।

राजभाषा है यह अपनी 

है बड़ी धरोहर,

कितने अच्छे छंद हैं इसमें 

हैं श्रेष्ठ कविवर। 

मैं भी हूं कवयित्री प्रज्ञा' नाम है मेरा, हिंदी है मेरी प्रिय भाषा भारत भूमि बसेरा।।


आप सभी को हिंदी दिवस की बहुत-बहुत शुभकामनाएं।।


Saturday, 11 September 2021

हम तेरे बिन अब रह नहीं सकते

 धरा पर किसका ये बसेरा है

नीर गिरता है ये नया सवेरा है 

अश्क से धुल ​गए हैं जख्म अब तो

चहुँ ओर छाया कैसा अंधेरा है ?

लब को लब नहीं कहा जाता

दर्द अब और नहीं सहा जाता।

बिखरा सा पड़ा है ये सामान सारा

थक गई हूँ अब समेटा नहीं जाता।

कोई तो रोक कर मेरे आँसू 

ये कह दे

हे प्रिये ! अब तुझ बिन रहा नहीं जाता...!!

संघर्ष

 जीवन में कठिनाईयाँ तो

आती रहेंगी।

आकांक्षाओं की थाली यूँ ही सजती रहेगी।

हम करेंगे संघर्ष से वार, 

कठिनाईयाँ भी हमसे पराजित होती रहेंगी ।

Thursday, 9 September 2021

खुले हैं द्वार चले आओ तुम

 खुले हैं द्वार चले आओ तुम 

अब हमको न यूं सताओ तुम। 

जिंदगी तो पहले ही बेवफा थी 

अब किस्मत को बेवफा ना बनाओ तुम।

दीप टिम टिम से जगमगाते हैं 

भंवरे भी प्रेम गीत गाते हैं।

यौवन में उच्छवास होता है

जब कोई मीत पास होता है।

इच्छा की छोटी-सी कुमुदिनी में

सच होने का स्वप्न होता है। 

डूबी नाव को खेवाओ तुम,

खुले हैं द्वार चले आओ तुम

अब हमको न यूँ सताओ तुम।।


बेवफा तो नहीं

 एक कवि हो कर 

एक कवि का दर्द कहां समझते हो, प्यार करते हो मुझसे पर 

मुझको कहां समझते हो ? 

नींद में लेते हो तुम किसी और का नाम....!

बेवफा तो नहीं पर 

वफादार भी नहीं लगते हो।


कैसे कर लूँ तुमसे प्यार??

 हम कैसे करें ऐतबार!

कर भी लें कैसे तुमसे प्यार!

क्या भरोसा है कि तुम हमें 

दगा ना दोगे

मेरे हाँथों को उम्र भर के लिए 

थाम लोगे।

जब अपनों ने ही अपना ना समझा,

ये दिल एक दरख्ते से जा उलझा।

आस लगाई हमनें एक हरजाई से,

स्वप्न में भी वो दिखाई दे।

देखो मेरे गीतों का वही है आधार 

फिर कहो कैसे कर लूँ तुमसे प्यार।

Tuesday, 7 September 2021

बड़ा पछताओगे

 कितना रोए, कितना तड़पे, 

मचाए कितना शोर ! 

तू किसी और का हो चुका है 

यह समझाएं कैसे दिल को ?

तड़प है, नशा है, 

जुनून है तेरे इश्क का 

बिखरे जा रहे हैं हम 

तुझसे मोहब्बत करने के बाद

मिला कुछ भी नहीं इक दर्द के सिवा

बहुत पछता रहे हैं तुझसे,

इश्क करने के बाद।।


कवयित्री:- प्रज्ञा शुक्ला 

लखीमपुर कविता

 जिसने कुचला गाड़ी से वह गोदी में बैठा है  सीतापुर की जेल में बंद  एक कांग्रेसी नेता है  ये वर्तमान सरकार मुझे अंग्रेजों की याद दिलाती है जो ...