Saturday, 12 June 2021

बाल श्रम निषेध दिवस कविता

 "बाल श्रम निषेध दिवस"

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नन्हे सुमन हैं इनसे

क्यों करवाते हो मजदूरी 

पढ़ने दो स्कूल में इनको

ना करवाओ अब मजदूरी 

खिलेगे नन्हे पुष्प तो

भारत का नक्शा बदलेगा

इनके आगे बढ़ जाने से 

इनका भविष्य संभलेगा 

ये कोमल टेसू हैं 

मुरझा जायेगे झट से 

फिर कैसे होगे परिपक्व 

सुमन ये हँसते हँसते??

Friday, 11 June 2021

जिन्दगी की उलझनों से फुर्सत लेकर

जिंदगी की  उलझनों से फुर्सत लेकर 

आओ बैठो मेरे पास कुछ पल•••


दो आराम अपनी सांसों को

बंद कर दो मुट्ठी में सितारों को


......जुगनू बिछा दो पैरों के तले

आ पंख फैलाकर 

आसमान में उड़ चले•••


गर्म हो रहे हों जब 

आंखों के समंदर

बर्फीले एहसासों को

भर लो तुम दिल के अन्दर•••


भीग जाओ बारिश की बूंदों में 

बिखर जाओ मोतियों-सा तुम खुद में

°°°जिंदगी की उलझनों से फुर्सत लेकर 

आओ बैठो मेरे पास कुछ पल•••



दोबारा प्यार मुमकिन है??

 पहले प्यार के बाद क्या

दूसरा प्यार मुमकिन है??•••

दिल ने कहा...हाँ, मुमकिन तो है

पर किसी को दोबारा

टूट कर चाहना नामोमाकिन है••••


लफ्जों को जिस तरह

पहले प्यार में था बांधा

दोबारा वो एहसास कर पाना

नामुमकिन है•••••

आम में बौर आ गया

 एक दिन यूं ही अनजाने में 

खाया था एक आम

चूस कर  उसकी गुठलियां  

फेंकी थी

जमीन सूखी ही थी,

फिर कभी बरसात हुई

वो आम की गुठली 

पृथ्वी के गर्भ में समा गई,

सावन में उसने खोली दो आँखें 

कुछ महीनो में वो

जवान हो गया 

आज वर्षों के बाद देखा जब

तुम्हें तो याद आया

मेरे प्रेम रूपी परिपक्व आम में 

बौर आ गया।।

----✍️✍️By pragya shukla

"अभिधा का प्रयोग"


Tuesday, 8 June 2021

प्रज्ञा शुक्ला कौन हैं???

प्रज्ञा शुक्ला सीतापुर की एक नवोदित कवयित्री हैं। 
जिन्होंने हिंदी साहित्य में अपनी कविताओं से शोहरत हासिल की है तथा हिंदी साहित्य का सम्मान बढ़ाया है वह प्रतिभा की धनी हैं।।

सौंदर्य एक अनुभूति

सौंदर्य एक परम अनुभूति है
हमारे नेत्रों से आत्मसात होकर
अन्तस तक जाता है।
विचारों का सौंदर्य व्यक्तित्व को
आकर्षक बनाता है।
दैहिक सौंदर्य कामी बनाता है।
परंतु हृदय का सौंदर्य जीवन को
बहुमूल्य बनाता है


Friday, 4 June 2021

गीत नया गाता हूं

 तेरी कल्पनाओं का 

कायल हुआ जाता हूँ 

भावनाओं में तेरी 

बहता-सा जाता हूँ 

शब्द तुम्हारे फूटते हैं 

अंकुरित होकर 

तेरी स्मृतियों में खोया सा जाता हूँ 

दोपहर में तू घनी छांव सी है प्रज्ञा'

तेरी आँखों में डूबा सा जाता हूँ 

गीत तेरे बोलते हैं 

जो ना बोल पाती तू

तेरे उन गीतों को मैं 

एकाकी में गुनगुनाता हूँ 

गीत नया गाता हूँ 

गीत नया गाता हूँ ।।

----------✍✍

प्रज्ञा शुक्ला 




बाल श्रम निषेध दिवस कविता

 "बाल श्रम निषेध दिवस" ------------------ नन्हे सुमन हैं इनसे क्यों करवाते हो मजदूरी  पढ़ने दो स्कूल में इनको ना करवाओ अब मजदूरी  ख...